आज बहुत दिनों बाद वक़्त मिला है की कुछ लिख पाऊ...देखिये क्या .विडंबना है कि कभी लिखने को प्रधानता देने की चेष्टा करने वाली मैं अब बस किसी भी विषय पर बोलने और पढने तक सिमट कर रह गयी हूँ....मेरी यह स्थिति बिलकुल हमारी सरकार और देश में व्यापक होते नक्सलवाद की तरह है जिसपे हमारी सरकार बस प्रेसवार्ता करते नज़र आती है... हमारी सरकार की ये नपुंसकता देश में नक्सल को सुदृढ़ होने के लिए अनुकूल वातावरण दे रहा है और नक्सल पूरी सजगता से उस वातावरण में अपनी जडें मजबूत करने में लगा है.... कभी कभी तो मैं अपनी सोच को पंख लगने नहीं दे पाती कि वो गगनचुम्बी उचाई पर जाकर यह सोच सके कि आखिर दोषारोपण की प्रक्रिया कहाँ और किससे शुरू की जाए.....दोष किसे दिया जाए अपने देश कि इस परिस्थिति के लिए ??? एक वक़्त तो ऐसा लगता है कि हमारे प्रजातांत्रिक देश में सभी लोगों को दी जाने वाली लिबर्टी इसका बहुत बड़ा कारण है तो दूसरे पहर लगता है कि इस कौम के मौलिक अधिकार के साथ की गयी infedility की वजह से नक्सलवाद का ये हंगामा बरपा है जो हमें अभी थोड़े दिन पहले ही रणबीर कपूर की एक फिल्म rockstar का गीत " साड्डा हक एथे रख " कह कर जीभ चिढा रही है....
शब्दों के खेल को कुछ वक़्त के लिए छोड़ हम वास्तविकता कि ज़िन्दगी में चले तो सचमुच नक्सलवाद एक भीषण समस्या है हमारे देश की या यूँ कहें कि वर्त्तमान समय में नक्सलवाद हमारी इस developing एंड so called globalizing country के लिए आतंकवाद से भी बड़ी चुनौती है.... एक ऐसी चुनौती जिसका पर्याय हमारे पास इस समय नहीं है... और जिसका अंत हमारे वैज्ञानिकों की नवविवाहिता अग्नि-५ जैसी ballistic missile भी नहीं है... बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, बंगाल और मध्यप्रदेश में नक्सलवाद अपने प्रियजनों को दी जाने वाले आशीर्वाद दिन दोगुनी रात चौगुणी तरक्की की तरह अपनी शाख मजबूत किए जा रहा है और sound और लाइट की स्पीड की तरह सभी रुकावटों को भेदता जा रहा है जैसे की अभिमन्यु ने कौरवों के रचे ६ चक्रों को भेदा था...
नक्सली गतिविधियाँ इन दिनों काफी बढ़ गयी हैं....और अब उनका शिकार हो रहे हैं हाई handed people ...पिछले साल मचाये कई उत्पातों के बाद कई दिनों तक नक्सली शांत बैठे थे...लेकिन नक्सली नेता कोटेश्वर राव उर्फ़ किशनजी कि वेस्ट midnapore में २४ नवम्बर २०११ को एनकाउन्टर में हुई मौत कि खबर दावाग्नि की तरह इन ६ राज्यों के जंगलों में फैली और उसके साथ फैली नफरत की एक ऐसी आग जो अभी तक नहीं बुझी और न ही हाल फिलहाल बुझती हुई दिखाई दे रही है....नाक्सलिओं की बढती आपराधिक गतिविधियों को देखते हुए लगता है कि अगर ये आग बुझ भी जाएगी तो उसकी राख से phoenix और भी खतरनाक मंसूबों के साथ पैदा होगा.... अभी २६ अप्रैल को १ महीने बाद नाक्सालिओं के चंगुल से आज़ाद हुए बेजेडी विधायक झीना हिकाका को नक्सालिओं ने कितनी deals के बाद छोड़ा है कि अगर वो इन लोगों कि बातें न मनवा पाएं तो अपने पद से इस्तीफ़ा दे देंगे और ये इस्तीफ़ा सिर्फ पार्टी से नहीं राजनीति से भी होगा....वहीँ दूसरी तरफ सुकना के कलेक्टर alex paul menon की रिहाई के ऐवज में 17 naxalites की फेहरिश्त २७ अप्रैल को छत्तीसगढ़ सरकार को थमा दी है.... दूसरी तरफ alex अस्थमा से पीड़ित हैं और उनकी बीवी बार बार सरकार से गुहार लगाई हैं कि कलेक्टर को छोड़ दिया जाए... इस मामले में मध्यस्तता करने के लिए पहले ३ लोगों के नाम आगे रखे गए लेकिन हास्यास्पद और शर्मनाक बात ये है कि प्रशांत भूषण जैसे बड़े वकील ने बिचौलिए के इस काम से मना कर दिया ....क्यूंकि पिछले १ साल से front पर आकर भ्रष्टाचार से लड़ने वाले प्रशांत अपने डर से हार गए...इस बात ने और भी तूल तब ली जब प्रशांत भूषण ने कहा कि नाक्सालिओं कि सभी मांगे जायज़ हैं....
अब विचारणीय विषय यह है कि यह देश जो खुद को अमरीका कि तरह बनाना चाहता है और उसकी ही ideology follow कर रहा है कब ये भी समझ पाएगा कि अमरीका के लिए उसके लोगों कि अहमियत उनकी कुर्सी से ज्यादा है...और अमरीका के मंत्रियों के लिए आतंकवाद का मुद्दा किसी छोटे से कस्बे का मुद्दा न रह कर पूरे देश की इज्ज़त के मुद्दा बनता है ....लेकिन हमारे देश में हमारे गृह मंत्री के लिए नक्सल हमलों का मुद्दा उस राज्य तक ही सिमित रहता है जहाँ ये हमला हुआ है....नक्सल के इस फलते फूलते जहाँ को जल्दी ही रोकने के लिए कड़े से कड़े क़दम उठाना बहुत ज़रूरी है नहीं तो वो दिन बिलकुल दूर नहीं होगा कि इस ६ राज्यों के अलावा पूरा देश इस नयी चुनौती के ग्रास बन जाए.....
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